चौथी योजना कार्यक्रम और लक्ष्य

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योजना आयोग

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भारत की चौथी पंचवर्षीय योजना का प्रारूप 29 अगस्त 1966 को संसद में प्रस्तुत किया गया। यह योजना ऐसे समय में बनाई गई जब देश कृषि-उत्पादन में कमी, बढ़ती महँगाई तथा भुगतान-संतुलन की अनिश्चितताओं जैसी गंभीर आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा था। अतः इन चुनौतियों के समाधान के लिए योजना में विशेष रूप से कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। योजना का मुख्य उद्देश्य कृषि-उत्पादन में प्रतिवर्ष लगभग 5.6 प्रतिशत की वृद्धि सुनिश्चित करना था, जिसके लिए उर्वरकों, उच्च उत्पादक बीजों, सिंचाई सुविधाओं, कृषि अनुसंधान तथा ग्रामीण अवसंरचना के विकास पर बल दिया गया। चौथी योजना के कुल परिव्यय का लगभग एक-चौथाई भाग कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों पर व्यय किया जाना निर्धारित किया गया। इसमें सिंचाई परियोजनाएँ, उर्वरक एवं कीटनाशक उत्पादन, कृषि यंत्रों का निर्माण, ग्रामीण सड़कों तथा कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं का विस्तार शामिल था। इसके साथ-साथ किसानों को उचित मूल्य, कृषि ऋण तथा वैज्ञानिक कृषि विधियों को अपनाने हेतु प्रोत्साहन देने की नीति भी अपनाई गई। औद्योगिक क्षेत्र में सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्रों के माध्यम से भारी उद्योगों, मशीन निर्माण, तेल खोज, उर्वरक उत्पादन तथा परिवहन उपकरणों के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके। विद्युत और परिवहन सुविधाओं का विस्तार कृषि और उद्योग दोनों के विकास के लिए आवश्यक आधार के रूप में किया गया, जिसमें विद्युत उत्पादन क्षमता को दोगुना करने तथा ग्रामीण विद्युतीकरण का लक्ष्य रखा गया। इसके अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, जल-आपूर्ति तथा तकनीकी प्रशिक्षण जैसे सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के विस्तार की भी व्यवस्था की गई। जनसंख्या वृद्धि और खाद्य-उत्पादन के बीच असंतुलन को कम करने के लिए परिवार-नियोजन कार्यक्रमों पर विशेष बल दिया गया। कुल मिलाकर, चौथी पंचवर्षीय योजना भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता, आत्मनिर्भरता और संतुलित विकास की दिशा में आगे बढ़ाने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास थी।

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भारत सरकार योजना आयोग

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Planning Commission - 1966

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